मॉनसून के दस्तक के साथ ही कोसी नदी में मंडराया बाढ़ का खतरा, सहमे इलाके के लोग

सुपौल, एमएम : बिहार में मॉनसून दस्तक दे चुकी है। मानसून की बारिश होने लगी है। 15 जून से बाढ़ की अवधि शुरू हो गई है और कोसी के इलाके में लोगों के माथे पर चिता की लकीरें फिर से दिखने लगी। अब कोसी की प्रलयलीला शुरू होगी। कोसी तटबंध के अंदर बसे गांवों की तबाही शुरू हो जाएगी।

हर साल कोसी बाढ़ की अवधि में सुपौल, सहरसा और मधुबनी जिले के 380 गांवों को तबाह करती है। उन्हें चिता सताने लगी है कि एक बार फिर से उन्हें बाढ़ और विस्थापन का दंश झेलना पड़ेगा। नेपाल के तराई क्षेत्रों में जैसे ही वर्षा होती है कोसी नदी का जलस्तर बढ़ जाता है और तटबंध के अंदर बसे गांवों में तबाही मच जाती है। घर-घर बाढ़ का पानी घुस जाता है, लहलहाती फसलें डूब जाती है और भागम-भाग की स्थिति बन आती है। अमूमन 15 अगस्त के बाद कोसी के इलाके के लोग बाढ़ के खतरे की समय-सीमा समाप्त होने के बाद चैन की नींद लेते हैं। हाल के वर्षों में सुपौल जिले के मरौना प्रखंड क्षेत्र के खोखनाहा, अमीन टोला, लक्ष्मीनिया सहित दर्जनों गाँव में बाढ़ का कहर बरपता है।

आलम यह है की अब इस क्षेत्र के लोग अभी से नए ठिकाने की तलाश में जुट गए हैं। ग्रामीणों का मानना है कि कब कोसी में बाढ़ आ जाए कोई पता नहीं। कोई तारीख तो तय रहता नहीं इसलिए एतियातन पहले से इंतजाम करना पड़ता है। राशन और रहने का इंतजाम नहीं करेंगें तो विपदा के समय क्या खायेंगे। उस समय तो सरकार बस खानापूर्ति करती है। मरना तो आम जनता को ही है।

लंबे समय से कोसी का कटाव और बाढ़ झेल रहे हैं। अब तो कोशी क्षेत्र के लोग ये भी कहने में कोई गुरेज नहीं करते की जहां धर वहीं घर हुआ करता है। इसके पीछे भी कारण है। लोग अपने माटी की मोह नहीं छोड़ पाते हैं।

दरअसल कोसी के पूर्वी व पश्चिमी तटबंध के बीच लाखों की आबादी बसती है। तटबंध के भीतर की जमीन उपजाऊ होने के कारण तटबंध के भीतर बसे लोग जमीन का लोभ नहीं त्याग कर पाते और यहां खेती कर अपना जीवन-यापन करते हैं। किन्तु बरसात के दिनों में इनकी फजीहत होती है। बाढ़ के कहर के बाद इन्हें मजबूर होकर पलायन को विवश होना पड़ता है। तटबंध के बाहर ये लोग ऊंचे स्थान पर आकर कुछ दिनों के लिए शरण लेते हैं और बाढ़ का पानी उतरते ही फिर अपने घर लौट जाते हैं। हर वर्ष यही कहानी दोहराई जाती है और ऐसे ही कटती है तटबंध के बीच बसे लोगों की जिदगी।

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