प्रख्यात युवा हिंदी सिनेस्टार सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद एक नया विमर्श शुरू हो गया है

प्रख्यात युवा हिंदी सिनेस्टार सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद एक नया विमर्श शुरू हो गया है। भाई-भतीजावाद यानि नेपोटिज़्म पर भी काफ़ी चर्चा हो रही है। युवाओं में मानसिक तनाव और आत्महत्या की प्रवृत्ति चिंता का विषय है। कल शाम दोनों बेटियों ने इस विषय को लेकर चर्चा शुरू कर दी जो देर रात 1 बजे तक चली। ये बच्चे 11वीं और 10वीं के हैं। मिलेनिअल किड्स! मुझे अत्यंत गम्भीरता से उन्हें सुनना पड़ा और कई तरह की शंकाओं का समाधान करना पड़ा! चर्चा की गंभीरता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हम लगभग तीन घण्टे तक इस विषय के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करते रहे।

सचमुच, सुशांत की मृत्य को बहुत गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। युवाओं में जीवन के प्रति पलायन की मानसिकता बोध घोर चिंता का विषय तो है ही साथ ही अत्यंत संवेदनशील और चिंतन का भी है। कल एक दिन में चार युवाओं ने अपनी जान ले ली। सभी 20 से 30 के आयुवर्ग के थे। इस उम्र में ऐसा क्या उनके मन मस्तिष्क में चल रहा है जो मानसिक रूप से उन्हें आत्महत्या करने पर विवश कर देता है? युवाओं से जुड़ा विषय है, देश युवाओं का है, देश का 65% आबादी युवाओं का है, युवा ही भविष्य हैं, तो इस प्रकार से युवाओं का खासकर प्रतिभाशाली युवाओं का इस प्रकार चले जाना समाज और राष्ट्र के लिए भी बड़ी क्षति है।

मैं समझता हूँ कि जीवन और सँघर्ष दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जबतक जीवन है तबतक सँघर्ष है। यानि जीवन संघर्ष है और संघर्ष जीवन। जीवन में संघर्ष की अनिवार्यता है। संघर्ष नही तो जीवन का महत्व कहाँ? बीती रात बच्चों के साथ हुई बातचीत का सारांश यहाँ रखने की कोशिश कर रहा हूँ। हममे से कइयों को अपना सा लगेगा और क्या पता किसी के लिए कुछ भी लाभकारी हो जाए!

संघर्ष कई प्रकार के हो सकते हैं, कोई अभावग्रस्त है तो समृद्धि के लिए संघर्षरत है, कोई अपनी पहचान बनाने के लिए तो कोई अपने आपको दूसरों से बड़ा और प्रभावशाली दिखाने के संघर्षों में जुटा हुआ है। इनमें से किसी की प्राप्ति पर ही हमारा सँघर्ष रुक नहीं जाता बल्कि हम सब लगातार आजीवन किसी न किसी सँघर्ष से जूझते ही रहते हैं। पहले बेसिक ज़रूरतों के लिए, वो हो गया तो फिर लक्ज़री के लिए और उसके बाद फिर नाम-पहचान-रुतबा-सम्मान आदि के लिए। और यही सँघर्ष जब महत्वाकांक्षी हो जाता है तो आशा के अनुरूप कार्य और उसका परिणाम न होने पर मन अवसादग्रस्त हो जाता है और मानसिक अशांति धीरे धीरे विकराल रूप धारण कर लेती है जो कई प्रकार के विकारों को मन मे जन्म देती हैं और उसे पुष्पित पल्लवित करती रहती है। उस दौरान यदि आप धैर्यवान हैं, या ईश्वर पर अटूट आस्था है, या कोई मार्गदर्शन करने वाला पारिवारिक सदस्य, गुरु, मित्र का सान्निध्य मिल जाता है तो उन नकारात्मक विचारों वाले विकारों का शमन हो जाता है।

यहाँ धैर्य की सर्वोच्च प्राथमिकता है। ईश्वर पर अटूट आस्था से भी धैर्य धारण करने में सहूलियत होती है। ईश्वर ने ही हमसबको बनाया है, चींटी को भी और हाथी को भी। वह दोनों के भोजन का प्रबंध करता है। सबकी चिंता करना उसका काम है। हम सब उन्ही के बनाये हुए हैं हमारी भी चिंता ईश्वर करेंगे ऐसा दृढ़ विश्वास ही ईश्वर पर अटूट आस्था मानी जा सकती है। पारिवारिक सदस्य, गुरु, मित्र आदि से बात करके हम इन सब विषयों पर अपने विश्वास और धैर्य को मजबूत कर सकते हैं। जो हमें ऐसी प्रवृत्तियों को अपने ऊपर हावी नही होने देते। हाँ इसमे कुछ अपवादस्वरूप कुछ मित्र या पारिवारिक सदस्य हो सकते हैं जो आपसे ईर्ष्या रखते हों तो सही और उचित मार्गदर्शन न करें मग़र अधिकतर मामलों में यह सकारात्मक ही होता है।

जहाँ तक जीवन में सफलता प्राप्त करने की बात है तो उसमें भी मेरा अनुभव अभी तक के जीवन का जो रहा है उसमें सँघर्ष की प्रचुरता ही रही है। अभी तक कोई बड़ी उपलब्धि हासिल कर लिया हो ऐसी कोई बात नहीं है मगर जिन परिस्थितियों में यहाँ तक भी पहुँचे उसमे नकारात्मक विचारों का समावेश करता तो शायद शुरुआती दिनों में ही आत्महत्या कर लेता। मगर अपने गुरु दादाजी के द्वारा बचपन में दी गयी शिक्षा और चेतना के उच्च स्तर ने हमेशा नकारात्मकता के ऊपर धैर्य को रखकर उसे सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित करने का काम किया। 7वीं कक्षा से अधिक न पढ़ सकने की परिस्थितियों से जूझते हुए ईश्वर पर अटूट श्रद्धा के कारण कॉलेज की शिक्षा पूरी कर पाना आज भी सपनों जैसा ही लगता है। शुरुआत के संघर्ष के दिनों में दिल्ली जैसे शहर में भी दो हफ्ते में एक-दो दिन भोजन करके मनोबल बनाकर रखना आज भले विश्वास करने योग्य नही लग रहा मगर याद करके ऑंखें ज़रूर गीली हो जाती हैं। नौकरी पाने का संघर्ष, उसमे बने रहने का संघर्ष और फिर व्यवसाय में भी लोकल प्रतियोगियों के मुकाबले स्वयं को साबित करने का संघर्ष बिहार के एक छोटे से गाँव से आने वाले मुझ जैसे सामान्य इंसान के लिए कितना मुश्किल हो सकता है इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

आप 21 करते हैं तो आपको 19 आँका जाना, और लोकल व्यवसायी के 19 को भी 21 आँका जाना आदि आदि बहुत सारी ऐसी घटनाएं जो आपको कई मोड़ पर विचलित कर सकती हैं। परंतु धैर्य और चेतना आपको मजबूत बनाता है। वैसी स्थितियों में भी कमिटमेंट, सच्चाई पंक्चुएलिटी आदि के दम पर 21 साबित होना विश्वास को बढ़ाता चला गया। दादा जी ने समझाया था, मनुष्य के जीवन मे एक ‘गोल्डन टाइम’ ज़रूर आता है, हर किसी के जीवन मे। किसी के जीवन मे थोड़ा पहले तो किसी के थोड़ा बाद। मग़र आता ज़रूर है। उस ‘गोल्डन टाइम’ मे मनुष्य मिट्टी भी छुए तो सोना बन जाता है। उस सुनहरे वक्त का धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करना चाहिए। घबराना नही चाहिए। कितनी भी बड़ी मुसीबत आ जाये, कितनी भी बड़ी और अंधेरी रात हो, सुबह निश्चित है। अमावस्या के बाद ही इजोरिया का समय आता है। यह एक सतत प्रक्रिया है जो चलती ही रहती है। धैर्यवान पुरुष के लिए तो रात आये तो खुश हो जाये कि इसका मतलब शीघ्र ही उजाला होने वाला है। उजाला से अधिक खुशी तो अंधेरा में है क्योंकि एक उम्मीद होती है उजाले के शीघ्र आने की। जबकि उजाला आ गया तो रात आने की चिंता भी साथ है। यहाँ अँधेरे और उजाले का तात्पर्य सुख-दुख से है, अच्छे बुरे समय से। ये सब मुझे मेरे दादा जी ने बाल्यावस्था में ही बताया था। वह बहुत विद्वान थे, संस्कृत विद्यालय में प्रधानाध्यापक थे। उस समय का ज्ञान कच्चे मन पर पक्का बनकर स्थिर हो गया जो अब लगता है जीवनसाथी बन चुका है। बहुत मदद मिलती है मुझे बचपन मे दादाजी की दी हुई शिक्षा से।

आज भी हर पल हर दिन एक अलग और नए सँघर्ष से लड़ता रहता हूँ मज़बूत मनोबल के साथ। शायद जीवन भर लड़ना पड़े मगर हार नहीं मानूँगा। काश आज के बच्चों को भी नैतिक मूल्यों की शिक्षा उसी प्रकार दी जाती जैसा मेरे समय था। हमें पता नही अगला पल कैसा हो अत्यधिक अंधेरा आये तो बस ईश्वर का ध्यान करके उस समय के बीत जाने की प्रतीक्षा करनी चाहिये। वह बीत जाएगा इस बात को सभी जानते हैं। मगर हम उस दौरान धैर्य खोकर कुछ उल्टा-पुल्टा कर बैठेंगे तो हमारे साथ साथ बहुतों के जीवन में उथल पुथल हो सकता है। सुशांत के जाने के बाद जहाँ उनके परिवार में उथल पुथल तो हुआ ही, हज़ारों युवाओं के जीवन पर भी इसका गहरा असर पड़ा है। यदि उनके मृत्यु का कारण नेपोटिज़्म है या कोई और भी साज़िश तो उसकी जाँच होनी चाहिए। और जो भी इसके पीछे हैं उन्हें सज़ा भी मिलनी चाहिए। किसी की बपौती संपत्ति नही है देश का कोई भी क्षेत्र। यह देश हम सबका है। सबको बराबर अधिकार है अपनी प्रतिभा से आगे बढ़ने का। हम सबको आगे आकर इसका विरोध करना चाहिए। यदि ऐसा नही हुआ तो हम कई प्रतिभाओं से हाथ धो लेंगे। मगर आजके युवाओं को यह भी समझना चाहिये कि जीवन का इतिश्री कर लेना इसका निदान नहीं है, सँघर्ष को अपना साथी बनाकर, धैर्यपूर्वक अपने गोल्डन टाइम का इंतज़ार करिये, सही उद्देश्यों और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़िए। अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का बोध रहे। जीवन की सफलता के मायने बदलते रहेंगे। सामने कितनी भी बड़ी मुसीबत हो कैसा भी बुरा वक्त हो उसे खतम होना ही पड़ेगा। कोई भी समस्या आपके दृढ़ ईच्छाशक्ति, संकल्प और मनोबल से बड़ा नहीं हो सकता। आप ईश्वर की अनमोल कृति हैं। अपने जीवन को व्यर्थ न जाने दें।

(लेखक अमर नाथ झा, भारतीय जनता पार्टी के पूर्वांचल प्रकोष्ट से जुड़े हुए हैं एवं विभिन्न सामाजिक कार्यों में सतत अग्रसर रहते हैं। लेखक के विचार से संपादक मंडल का सहमत होना आवश्यक नहीं है। आप अमर नाथ झा से उनके ई-मेल आईडी anj9876@gmail.com से संपर्क कर सकते हैं।)

One Reply to “प्रख्यात युवा हिंदी सिनेस्टार सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद एक नया विमर्श शुरू हो गया है”

Leave a Reply