भारत-चीन युद्ध: दुनियां का रुख और देश की सबसे बड़ी चुनौती

अब जबकि लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक भारत और चीन की सेनाएँ आमने सामने हैं, भारत आनन फ़ानन में रूस से हथियारों की खेप ले रहा है, महीने के अंत तक राफ़ेल भी भारत की धरती पर उतरने वाला है और आज हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सीमा पर जाकर शेर गर्जना कर चुके हैं, युद्ध की सम्भावना बढ़ गयी है। ऐसे में जबकि दुनियां भर की नजर भारत और चीन के तनाव पर है, हम सबके सामने दो सबसे बड़े सवाल हैं कि अगर युद्ध हुआ तो दुनियां क्या करेगी और भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी ? क्या दुनियां भी साथ लड़ेगी? यदि हाँ तो किसके साथ होंगे बड़े देश?

चूँकि अमरीका अब भी सबसे बड़ी शक्ति है, उसका रुख बहुत महत्वपूर्ण होगा। आम तौर पर अमरीका की छवि एक चतुर चालाक देश की रही है। भारत की आजादी और फिर पाकिस्तान के बनने के बाद से अमरीका ने पहले दोस्ती का हाथ भले ही भारत की ओर बढ़ाया हो, नेहरू ने उसे ठुकरा दिया और फिर उस वक़्त से ही अमरीका पाकिस्तान के करीब आया। पाकिस्तान की सेना का चयन उस वक़्त चीन और रूस के साम्यवाद से लड़ने वाली अमरीकी सेना साउथ एशिया ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन और सेन्ट्रल ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन में भी हुआ। तब से लेकर अबतक अमरीका खुद को मात्र बैलेंस करता आया है। हाँ, चूँकि चीन अमरीका का दुश्मन नंबर 1 है, वो भारत को अंदुरुनी मदद अवश्य करेगा। यह मदद ख़ुफ़िया जानकारी साझा करना और जलसेना को मदद सम्बंधित भी हो सकती है। अमरीका शायद यह भी करे कि तेल उत्पादन करने वाले देशों को चीन को सप्लाई देने से मना करे। किन्तु खुले तौर पर अमरीका इस लड़ाई में भारत के समर्थन में आकर नहीं लड़ेगा।

रूस जैसा देश जो कभी भारत को संयुक्त राष्ट्र का स्थायी सदस्य बनाने को आमादा था अब खुलकर भारत के समर्थन में नहीं आएगा। भारत-चीन की लड़ाई में अधिक सम्भावना है कि वो मध्यस्थता और शांति की बात अधिक करे। जापान सैन्य रूप से बहुत सशक्त देश नहीं है किन्तु उसकी आंतरिक सहमति अमरीका के रुख पर निर्भर करेगी। ब्रिटेन के भी जापान के राह चलने की अधिक सम्भावना है। भारत के समर्थन में खुल कर सामने आने वाले देश इजरायल और फ़्रांस हो सकते हैं जो हर तरह की सहायता को सदैव तत्पर होंगे। भारत के पड़ोसी देशों से भारत को कोई ख़ास उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। अफगानिस्तान भारत का हितैषी तो है किन्तु फिलहाल वो खुद की जमीन तलाश रहा है। श्रीलंका के मौन रहने की अधिक सम्भावना है जबकि बांग्लादेश और नेपाल के तटस्थ रहने की। पाकिस्तान हर संभव कोशिश करेगा की वो हमेशा की तरह दूसरा मोर्चा खोल दे और भारत को दोतरफा लड़ाई लड़ने को मजबूर करे।

ताज़ा सूचना यह भी है कि भारत-चीन के युद्ध की असली ज़मीन नेपाल की धरती हो सकती है। पिछले कुछ समय से चीन न केवल वहाँ अपने जासूस भर रहा है बल्कि वो अल बद्र नामक गुट के साथ भारत में ख़ुराफ़ात की तैयारी भी करवा रहा है। लाज़िमी है उसे इस काम में पाकिस्तान का साथ है, ISI चीन के लिए नेपाल में यह सहयोग आंदोलन चला रहा है। जैसा की दुनियां भर के विश्लेषक कहते आ रहे, युद्ध में भारत किसी भी तरीके से चीन से उन्नीस नहीं होगा बल्कि वो हर तरह से चीन को जवाब देने और शांत होने को मजबूर कर देगा। किन्तु भारत सरकार के सामने इस युद्ध से भी बड़ी चुनौती होगी देश की आंतरिक स्थिति। जबकि चीन और पाकिस्तान नेपाल के रास्ते हमारी आंतरिक शांति पर आक्रमण करने की तैयारी में हैं ही, एक विदेशी अख़बार की माने तो देश में जगह जगह सांप्रदायिक दंगों की सम्भावना होगी और यही भारत की सबसे बड़ी चुनौती बनेगी।

ऐसा अनुमान है कि युद्ध अधिक समय तो नहीं चलेगा किन्तु आंतरिक उथल पुथल को ठीक करने में भारत को अधिक समय भी लगेगा और अधिक संभव है कि देश को आर्थिक नुकसान भी भुगतना पड़ सकता है किन्तु अंत में यह भी तय है कि भारत विश्व भर में एक बड़ी सशक्त और आत्मनिर्भर देश के तौर पर उभरेगा।

‘‘लेखक प्रवीण कुमार बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत्त हैं। लेखक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं तथा न्यूज़ पोर्टल पर नियमित रूप से आलेखों के माध्यम से सक्रिय हैं। लेखक के विचार से संपादक मंडल का सहमत होना आवश्यक नहीं है। आप प्रवीण कुमार से उनके ई-मेल आईडी praveenindujha@gmail.com से संपर्क कर सकते हैं।’’

3 Replies to “भारत-चीन युद्ध: दुनियां का रुख और देश की सबसे बड़ी चुनौती”

  1. क्या लेखक यह कहना चाहते हैं कि इस त्रिस्तरीय युद्ध
    को भी भारत जीत लेगा ? अरूणाचल से लेकर गुजरात
    तक भारत एक साथ दुश्मन का सामना करने में सक्षम
    अगर हो भी तो आन्तरिक कलह का क्या ! अगर ऐसी
    कोई योजना नेपाल के रास्ते भारत में कार्यान्वित होने
    वाली है तो वो युद्ध के समय ही होगी ! ऐसे में भारत की
    समस्या गुणात्मक रूप से बढ़ेगी । मेरा मानना है कि
    युद्ध की सिर्फ बड़ी बड़ी बातें होंगी , युद्ध नहीं होगा ।
    भारत को आर्थिक रूप से चीन की नकेल कसनी चाहिए
    और सामरिक रूप से पाकिस्तान की । यह भी हो
    सकता है कि मोदी लद्दाख की लड़ाई को पीओके लेकर
    चलें जायें ! मोदी है रे बाबा !! कुछ भी नोटबंदी टाइप
    कर सकते हैं !!

  2. Bhart ki sarkar apne niti me nihsankoch safal hongi hi. Usme manniye PM sahab apna aisa chal chalenge ki China ki sari niti bauni par jayengi.

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